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मां तेरे हाथ से बनी चाय की बात ही कुछ और थी…

जब मुझे जगाती थी सुबह बड़े प्यार से,
और बोलती थी- ले बेटे चाय बन गई उठ जा, मुंह धो कर चाय पी ले।
मां तेरे हाथ से बनी चाय की बात ही कुछ और थी।।

अब मुझे जगाती हैं जिम्मेदारी और बेचैनियां यहां,
वो तेरी ममता की प्याली कहां, अब तो खुद ही बना कर पीनी पड़ती चाय यहां।
मां तेरे हाथ से बनी चाय की बात ही कुछ और थी।।

जब कर रहा था मैं अपने सुनहरे भविष्य की तैयारी,
तुम बिना बोले ही कर देती थी मेरे लिए चाय की तैयारी,
रात को पढ़ते समय नींद ना आ जाए तुम भी पास बैठे कुछ काम किया करती थी,
आने लगती थी नींद की झपकी मुझे तब जट्ट से चाय बना पिला देती थी।
मां तेरे हाथ से बनी चाय की बात ही कुछ और थी।।

वर्दी पहनने का ख्वाब लिए सो जाता था मैं,
सुबह जल्दी उठकर दौड़ की तैयारी करने निकल जाता था मैं,
तब मां तुम फिर से एक कप चाय बड़े प्यार से पिला देती थी।
मां तेरे हाथ से बनी चाय की कुछ बात ही और थी।।

मां तेरे प्यार, आशीर्वाद में और तेरे हाथ से बनी चाय के जोश में,
बिना थके ही हर रोज कब पांच किलोमीटर दौड़ आता पता नहीं चलता था।
मां तेरे हाथ से बनी चाय की बात ही कुछ और थी।।

सफल हुए इम्तिहान में, वर्दी मिली तेरे लाल को,
पर मन में आज भी सोच कर रो देता हूं,
मां इस वर्दी ने बहुत दूर कर दिया तुझसे तेरे लाल को।
मां तेरे हाथ से बनी चाय की बात ही कुछ और थी।।

अब इस चाय में वह स्वाद कहां,
ना दिखता है इसमें जोश यहां,
ना होती वर्दी से मोहब्बत हमें तो लौट आता वापस मां तेरे पास यहां,
फिर तू कहती बेटा थक गया होगा बना देती हूं अभी एक कप चाय यहां।
मां तेरे हाथ से बनी चाय की बात ही कुछ और थी।।

अब वह प्यार कहां, अब वह एहसास कहां,
अब अपना गांव कहां, अब अपना परिवार कहां,
इस वर्दी की जिम्मेदारी में, मेरे परिवार की जिम्मेदारी कहां,
बिखर गए सब सपने, एक सपने को पूरा करने में,
फिर भी गर्व हैं इस वर्दी पर मुझे,, हर किसी को मिलती यह वर्दी इतनी आसान कहां।
मां तेरे हाथ से बनी चाय की बात ही कुछ और थी।।

आरक्षक विनोद राठौर
थाना शामगढ जिला मंदसौर

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